देवर ने वो दिया जो पति ने नहीं दिया

नागौर के उस छोटे से गाँव में, जहाँ रेत की लकीरें रात को चाँदनी में चाँदी-सी चमक उठती हैं, सर्दी की वो रात कुछ अलग ही थी। हवा इतनी ठंडी कि साँसें भी जम सी जातीं। घर की पुरानी लकड़ी की छत पर हल्की-हल्की सरसराहट थी, जैसे कोई पुरानी यादें जगा रही हों। श्रीष्टी आँगन में खड़ी थी, हाथों में कपड़ा लपेटे, लेकिन नज़रें छत की तरफ़। वो जानती थी कि ऊपर विजय है। शहर से आया हुआ देवर, जो इन दिनों छुट्टियाँ बिताने गाँव आया था। अमर सिंह, उसका पति, अभी तक खेतों से लौटकर सो चुका था—थकान से भारी साँसें लेते हुए। सास-ससुर भी अपने कमरे में थे। घर में सन्नाटा था, सिर्फ़ बाहर कहीं दूर कोई गाँव का कुत्ता भौंक रहा था।

श्रीष्टी ने गहरी साँस ली। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, बार-बार कमर पर लिपट रहा था। वो सोच रही थी—कितनी अजीब बात है। सालों से यही जीवन, यही रूटीन। सुबह उठना, चूल्हा जलाना, खाना बनाना, खेतों का काम संभालना, रात को बिस्तर पर लेटना और अमर सिंह का जल्दी-जल्दी काम तमाम करके सो जाना। कभी वो गर्माहट नहीं मिली जो औरत के भीतर की आग को भड़काए। कभी वो स्पर्श नहीं जो रात भर याद रहे। वो खुद को कोसती थी—क्या मैं इतनी बुरी हूँ कि पति को भी मेरी तरफ़ खिंचाव नहीं होता? या उम्र बीतने लगी है? लेकिन आज शाम से कुछ अलग था। विजय जब घर आया था, तो उसकी नज़रें… वो नज़रें जो बचपन में मासूम थीं, अब गहरी, भूखी, और कुछ कहती हुई लग रही थीं।

वो धीरे से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर कदम पर दिल की धड़कन तेज़। “क्या कर रही हूँ मैं? ये मेरा देवर है। अगर कोई देख लेगा तो इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।” लेकिन पैर रुक नहीं रहे थे। छत पर पहुँची तो विजय मुंडेर से टिका खड़ा था। हाथ में सिगरेट, लेकिन सुलगाई नहीं। वो मुड़ा। “भाभी… आप?” उसकी आवाज़ में हैरानी के साथ-साथ एक छुपी खुशी। श्रीष्टी ने नज़रें नीची कर लीं। “नींद नहीं आ रही थी। ठंड लग रही थी।” झूठ बोलते हुए भी उसकी आवाज़ काँप रही थी। विजय पास आया। इतना पास कि श्रीष्टी उसकी शर्ट से निकलती बॉडी की गर्माहट महसूस कर रही थी। ठंडी रात में वो गर्मी जैसे कोई दवा। “भाभी, आप काँप रही हैं।” उसने अपनी शॉल उतारी और उनके कंधों पर डाल दी। उँगलियाँ कंधे पर रुकीं। श्रीष्टी का शरीर सिहर उठा। “विजय… नीचे चलो। कोई जाग जाएगा।”

लेकिन वो हिली नहीं। विजय ने धीरे से कहा, “सब सोए हैं भाभी। भैया भी। आज रात… बस हम दोनों।” उसकी आवाज़ में एक गहराई थी जो श्रीष्टी के मन को छू गई। वो सोच रही थी—ये क्या हो रहा है? मैं उसकी भाभी हूँ। लेकिन उसकी आँखों में वो प्यास… वो प्यास जो सालों से मेरे भीतर दबी है। विजय ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा। हाथ गर्म था। श्रीष्टी ने छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन कमजोर। “विजय… ये गलत है।” उसकी आवाज़ काँप रही थी। विजय ने कहा, “पता है भाभी। लेकिन मैं रोक नहीं पा रहा। आपकी वो साड़ी में लहराती कमर, वो छातियाँ… रातों को सोचता हूँ।” श्रीष्टी की साँस रुक गई। वो जानती थी कि विजय दिन भर उसे देखता रहा था—जब वो आँगन में झाड़ू लगा रही थी, जब रसोई में झुकी थी, जब साड़ी का पल्लू सरक गया था। और वो भी महसूस कर रही थी।

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चुप्पी छा गई। सिर्फ़ हवा की आवाज़। विजय ने एक कदम और पास आया। अब उनकी साँसें मिल रही थीं। श्रीष्टी की आँखें बंद हो गईं। विजय ने उसके गाल पर हाथ फेरा। नरम स्पर्श। “भाभी… आप कितनी सुंदर हैं।” श्रीष्टी काँप उठी। मन में हजार सवाल—रिश्ता, इज्जत, पाप, समाज। लेकिन बॉडी बोल रही थी। उसकी छातियाँ भारी हो रही थीं। नीचे चूत में एक हल्की सनसनी। विजय ने धीरे से उसके होंठों पर होंठ रख दिए। पहला चुंबन—हल्का, डरते हुए। श्रीष्टी की बॉडी में बिजली दौड़ गई। वो पीछे हटीं, लेकिन विजय ने कमर पकड़ ली। “भाभी… बस एक बार।” श्रीष्टी ने कुछ नहीं कहा। बस होंठ फिर मिलाए। चुंबन गहरा हुआ। जीभें मिलीं। विजय के हाथ कमर पर सरके, साड़ी की सिलवटों में। श्रीष्टी की सिसकारी निकली। “आह… विजय…”

विजय ने साड़ी का पल्लू धीरे से सरकाया। ब्लाउज दिखा। बटन एक-एक करके खोले। ब्रा में छातियाँ उभरी हुईं। विजय ने ब्रा के हुक खोले। नंगी छातियाँ चाँदनी में चमक रही थीं। “भाभी… कितनी नरम, कितनी गरम।” उसने दोनों हाथों से उन्हें भरा। निप्पल्स को उँगलियों से दबाया। श्रीष्टी की पीठ झुक गई। “ओह… विजय… चूसो उन्हें।” विजय ने मुँह में लिया, जीभ से खेलने लगा। श्रीष्टी की उँगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। सालों बाद कोई उसे ऐसे छू रहा था। उसकी चूत में गीलापन फैल रहा था। विजय की उँगलियाँ अब पेटीकोट के नीचे सरक रही थीं। पैंटी पर पहुँचीं। गीली। “भाभी… आपकी चूत कितनी तरस रही है। मेरे लिए।” श्रीष्टी ने जाँघें हल्के से सटा लीं, लेकिन फिर खोल दीं। “हाँ… छू लो विजय। मैं भी… रातों को सोचती हूँ तुम्हारे बारे में।”

विजय ने पैंटी सरकाई। उँगली चूत पर रखी। धीरे से अंदर। श्रीष्टी ने मुँह पर हाथ रख लिया। “आह… धीरे… दर्द हो रहा है… लेकिन अच्छा भी।” विजय धीरे-धीरे अंदर-बाहर कर रहा था। श्रीष्टी की कमर ऊपर-नीचे हो रही थी। वो खुद को रोक नहीं पा रही थी। “विजय… और गहरा…” विजय ने उसे चारपाई पर लिटाया। श्रीष्टी की साड़ी पूरी उतार दी। अब वो नंगी थी—गोरी बॉडी, भरी गाँड, गुलाबी चूत। विजय ने अपने कपड़े उतारे। उसका लंड बाहर आया—सख्त, मोटा, नसों से भरा। श्रीष्टी ने देखा। “विजय… इतना बड़ा… भैया का तो कभी…” वो रुक गई। विजय ने मुस्कुराकर कहा, “भाभी… आज मैं दूँगा वो जो भैया नहीं दे पाए।”

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श्रीष्टी ने हाथ बढ़ाया। लंड को सहलाया। गर्माहट महसूस की। फिर मुँह में लिया। जीभ से चाटा। विजय की सिसकारी निकली। “भाभी… कितना अच्छा लग रहा है।” श्रीष्टी धीरे-धीरे चूस रही थी। उसकी चूत अब बह रही थी। वो सोच रही थी—ये पाप है। लेकिन कितना मीठा पाप। विजय उसके ऊपर आया। दोनों की बॉडी चिपक गईं। विजय ने उसके होंठ चूमे। गहरा चुंबन। हाथ छातियों पर, कमर पर, गाँड पर। “भाभी… तुम्हारी गाँड कितनी मुलायम है।” श्रीष्टी ने कहा, “चुप… बस मुझे चाहो।” विजय ने लंड चूत पर रगड़ा। श्रीष्टी की आह निकली। “डालो… धीरे से।” विजय ने धक्का दिया। लंड अंदर। श्रीष्टी की आँखें बंद। “आह… फाड़ दो मेरी चूत विजय।”

विजय धीरे-धीरे धक्के मारने लगा। श्रीष्टी की कमर ऊपर उठ रही थी। वो उसका साथ दे रही थी। “हाँ… गहरा… मेरी चूत तुम्हारी है।” गति तेज़ हुई। पसीना। विजय ने गाँड जोर से दबाई। “भाभी… तुम कितनी सेक्सी हो।” श्रीष्टी ने कहा, “जोर से चोदो… जो पति ने नहीं दिया, वो तुम दो।” दोनों का क्लाइमेक्स आया। विजय ने अंदर झड़ दिया। श्रीष्टी काँप उठी। वो लंबे समय तक ऐसे ही लेटी रही।

बाद में दोनों चुप थे। ठंड लग रही थी। श्रीष्टी की आँखों में आँसू। “विजय… हमने क्या कर दिया? अगर भैया को पता चला तो?” guilt भारी था। विजय ने उसे गले लगाया। “भाभी… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। ये सिर्फ़ एक रात नहीं। मैं शहर वापस जाऊँगा, लेकिन ये याद रहेगी।” श्रीष्टी ने सिर हिलाया। “ये अंधा प्यार है विजय। जो कभी पूरा नहीं होगा। लेकिन आज… आज मुझे लगा मैं औरत हूँ।” वो चुप रही। नीचे घर सोया था। लेकिन उनकी दुनिया में अब एक गहरा राज़ था। एक राज़ जो कभी नहीं मिटेगा। रात बीत रही थी। सुबह सब सामान्य होगा। लेकिन श्रीष्टी जानती थी—ये रात हमेशा उनके बीच रहेगी। एक छुपा हुआ, दबी हुई, और कभी न भूलने वाला सुख।

 

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