नेहा की साँसें अभी भी किचन की ठंडी हवा में कंपकंपा रही थीं। सिंक पर रखा गिलास हल्का-सा काँप रहा था, जैसे उसकी उंगलियाँ। रात के ढाई बज चुके थे, घर में वो गहरा सन्नाटा था जो सिर्फ़ दिल्ली की पुरानी कोलोनियों में ही मिलता है—जहाँ दीवारें पतली हैं, लेकिन रिश्ते और भी पतले। ऊपर मम्मी-पापा सो चुके थे, उनकी हल्की खर्राटे की आवाज़ छत से आकर नीचे तक पहुँच रही थी। विक्रम भैया ट्रिप पर थे, और शालिनी भाभी भी ऊपर ही थीं। या कम से कम नेहा को यही लग रहा था।
वो बालकनी की तरफ़ मुड़ी। अर्जुन वहाँ खड़ा था। सिर्फ़ ग्रे ट्रैक पैंट, ऊपर कुछ नहीं। उसकी छाती पर पसीने की पतली चमक थी, जिम की वजह से कंधे चौड़े, बाइसेप्स में वो हल्की-सी उभार। नेहा की नजर वहाँ अटक गई। वो जानती थी कि ये गलत है, लेकिन आँखें नहीं हटा पा रही थीं। अर्जुन ने बिना मुड़े कहा,
“भाभी… फिर नींद नहीं आई?”
नेहा ने गले में अटकी सिसकी को निगला। “हाँ… गर्मी बहुत है।”
अर्जुन मुड़ा। उसकी आँखें अंधेरे में भी गहरी लग रही थीं। वो एक कदम आगे आया। नेहा पीछे नहीं हटी। बस साँस थोड़ी तेज़ हो गई। अर्जुन ने धीरे से कहा,
“आपकी साड़ी… पसीने से चिपक गई है।”
नेहा ने नजरें नीची कीं। उसकी साड़ी की पल्लू थोड़ी सरकी हुई थी, ब्लाउज़ के नीचे से पेट की नरम त्वचा झलक रही थी। अर्जुन की नजर वहाँ गई। वो करीब आया, इतना करीब कि नेहा को उसकी साँस की गर्मी महसूस हुई। अर्जुन ने हाथ बढ़ाया, लेकिन छुआ नहीं। बस हवा में रखा।
“भाभी… अगर मैं कहूँ कि मुझे भी गर्मी लग रही है… तो?”
नेहा की आँखें उठीं। उसकी पुतलियाँ फैल गईं। “अर्जुन… ये…”
अर्जुन ने उसकी कमर पर हल्का-सा हाथ रख दिया। सिर्फ़ स्पर्श। लेकिन वो स्पर्श बिजली-सा था। नेहा का शरीर सिहर उठा। उसकी आँखें बंद हो गईं। अर्जुन ने धीरे से उसे अपनी तरफ़ खींचा। उनके होंठ मिले। पहले सिर्फ़ छुअन। जैसे दोनों टेस्ट कर रहे हों कि ये सपना है या सच। फिर गहरा। नेहा की जीभ अर्जुन की जीभ से खेलने लगी। अर्जुन का हाथ उसकी कमर से ऊपर सरका, ब्लाउज़ के नीचे। नेहा की त्वचा गरम थी, पसीने से नम।
“भाभी… आपकी त्वचा… कितनी मुलायम,” अर्जुन ने उसके कान में फुसफुसाया। उसकी साँस नेहा के गले पर लग रही थी। नेहा ने जवाब में उसकी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। अर्जुन की सिसकारी निकली। वो नेहा को काउंटर पर उठाकर बैठा दिया। नेहा की टाँगें अपने आप उसके कमर पर लिपट गईं। अर्जुन ने उसकी साड़ी ऊपर सरकाई। नेहा की जाँघें नंगी हो गईं। अर्जुन ने उन्हें सहलाया, धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़। नेहा की साँसें तेज़। “अर्जुन… कोई सुन लेगा…”
“कोई नहीं सुन रहा,” अर्जुन ने कहा और उसके गले पर होंठ रख दिए। चूमा, चाटा। नेहा की आह निकल गई। अर्जुन का हाथ उसकी पैंटी पर पहुँचा। गीली थी। बहुत गीली। अर्जुन ने उंगली से बाहर से ही दबाया। नेहा का शरीर काँप उठा। “आह… वहाँ…”
अर्जुन ने पैंटी साइड से सरकाई। उंगली अंदर डाली। नेहा ने मुँह दबा लिया। “अर्जुन… धीरे… मैं… मैं…”
अर्जुन ने दूसरी उंगली भी डाली। धीरे-धीरे अंदर-बाहर। नेहा की कमर उठ रही थी। उसकी आँखें बंद, होंठ कटे हुए। अर्जुन ने उसके स्तनों पर मुँह लगाया। ब्लाउज़ के ऊपर से ही चूसा। नेहा ने उसका सिर पकड़ लिया। “जोर से… चूसो…”
तभी बाहर से हल्की आवाज़। पैरों की आहट। दोनों रुक गए। साँसें थम गईं। शालिनी भाभी। वो नीचे आ गई थीं। शायद पानी पीने।
“नेहा? अर्जुन?” शालिनी की आवाज़।
अर्जुन ने नेहा को जल्दी से नीचे उतारा। नेहा ने साड़ी ठीक की। अर्जुन ने टी-शर्ट पहनी। शालिनी किचन में आई। लाइट जला दी। सब कुछ देख लिया। नेहा की लाल आँखें, अर्जुन का पसीना, हवा में वो गंध।
शालिनी चुप रही। कुछ पल। फिर बोली, “मैं सोच रही थी… आज रात कुछ अलग क्यों लग रहा है।”
नेहा रोने लगी। “भाभी… मैं… सॉरी…”
शालिनी ने पास आकर नेहा के आँसू पोंछे। “चुप। रो मत।”
फिर शालिनी ने अर्जुन की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ और था। गुस्सा नहीं। एक गहरी, दबी हुई प्यास। “अर्जुन… तुम्हें पता है, मैं भी तुम्हें देखती रही हूँ। सालों से। लेकिन कभी कुछ नहीं कहा। क्योंकि मैं जेठानी हूँ। लेकिन आज… आज मैं छुप नहीं सकती।”
नेहा ने आश्चर्य से देखा। शालिनी ने अपना दुपट्टा उतारा। ब्लाउज़ की हुक खोली। उसके स्तन बाहर आए, भरे हुए, निप्पल्स सख्त। अर्जुन की साँस रुक गई।
शालिनी ने नेहा का हाथ पकड़ा। “नेहा… अगर तुम्हें बुरा न लगे… तो मुझे भी…”
नेहा ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। तीनों अर्जुन के कमरे में गए। दरवाजा बंद। लाइट कम।
अर्जुन ने दोनों को बिस्तर पर लिटाया। पहले शालिनी के होंठ चूमे। गहरा, भूखा। शालिनी ने जवाब दिया, उसकी जीभ अर्जुन के मुँह में खेल रही थी। नेहा देख रही थी, उसकी साँसें तेज़। शालिनी ने नेहा को पास खींचा। दोनों बहनें-सी एक-दूसरे को चूमने लगीं। नेहा की जीभ शालिनी की जीभ से मिली। अर्जुन देखता रहा। उसका लुंड सख्त, ट्रैक पैंट में उभरा हुआ।
शालिनी ने अर्जुन की पैंट उतारी। लुंड बाहर आया, मोटा, गरम। शालिनी ने हाथ में लिया। “कितना सख्त… कितने सालों से मैंने सोचा था…”
नेहा ने भी छुआ। दोनों ने मिलकर सहलाया। अर्जुन की आह निकली। शालिनी ने मुँह में लिया। चूसा, जीभ घुमाई। नेहा नीचे से उसके टेस्टिकल्स चाट रही थी। अर्जुन का शरीर काँप रहा था।
फिर अर्जुन ने शालिनी को लिटाया। टाँगें फैलाईं। उसकी चूत गीली, चमक रही थी। अर्जुन ने धीरे से घुसा। शालिनी की आह गहरी। “आह… अर्जुन… भर दो मुझे…”
नेहा शालिनी के स्तन चूस रही थी। निप्पल्स को दाँतों से काट रही थी। शालिनी सिसक रही थी। अर्जुन जोर-जोर से धक्के मार रहा था। कमरे में सिर्फ़ मांस की थपथपाहट और आहें।
फिर नेहा की बारी। अर्जुन ने उसे पीछे से पकड़ा। नेहा घुटनों पर। अर्जुन ने पीछे से घुसा। नेहा की गांड ऊपर, चूत में लुंड। “आह… अर्जुन… फाड़ दो…”
शालिनी नीचे लेटी, नेहा की चूत चाट रही थी। जीभ अंदर-बाहर। नेहा चीख रही थी, लेकिन मज़े से। अर्जुन ने नेहा की गांड पर थप्पड़ मारा। लाल निशान। नेहा और उत्तेजित हो गई।
रात भर। तीनों ने हर पोजिशन आजमाई। कभी अर्जुन दोनों के बीच, एक को चोदता, दूसरी चूसती। कभी नेहा और शालिनी 69 में, अर्जुन पीछे से किसी एक को। पसीना, रस, आहें। सब मिलकर एक गंध बन गई।
सुबह होने से पहले तीनों थककर लेटे। शालिनी ने नेहा को गले लगाया। “ये हमारा राज है। लेकिन रातें अब हमारी हैं।”
नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ भाभी।”
अर्जुन ने दोनों के माथे पर चूम लिया।
अगले दिन घर वैसा ही था। लेकिन जब नजरें मिलतीं, तो एक गर्माहट। एक वादा। रातें अब चुपके से शुरू होतीं। और गहराई से खत्म। बिना किसी को बताए। सिर्फ़ तीनों के बीच।