वेसेलिन लगाकर बूर फाड़ी

Naukrani ki chudai sex story: हेल्लो दोस्तों। मेरे नाम अमित है और मैं झाँसी का रहने वाला हूँ। हमारे घर में एक नौकरानी है जिसका नाम कविता है। कविता को हमारे घर वाले गाँव से लाये थे। उसकी उम्र मेरे बराबर ही थी और हम दोनों एक साथ ही जवान हुए थे। अब हम दोनों २० साल के थे और कविता का बदन एकदम खिल चुका था। उसकी चूचियां काफी बड़ी और गोल हो गई थीं तथा चूतड़ एकदम मस्त और भरे हुए हो गए थे जो देखते ही किसी भी जवान लड़के का लंड खड़ा कर देने वाले थे।

मैं भी जवान हो चुका था और दोस्तों से चुदाई के बारे में काफी जान चुका था पर कभी किसी लड़की को चोदने का मौका नहीं मिला था। कविता हमेशा मेरे सामने रहती थी जिसके कारण मेरे मन में कविता की चुदाई के ख्याल आने लगे थे। जब भी वो झाड़ू-पोछा करती तो मैं चोरी-चोरी उसकी बड़ी-बड़ी चुचियों को देखता था जो हर बार उसके ब्लाउज को फाड़ने को तैयार नजर आती थीं। हर रात कविता के बारे में ही सोच-सोच कर मुठ मारता था जिसमें मैं उसकी गोरी त्वचा, मटकते चूतड़ और भीगे हुए होंठों की कल्पना करता रहता था।

मैं हमेशा कविता को चोदने के बारे में सोचता था पर कभी न मौका मिला न हिम्मत हुई। एक बार कविता ३ महीने के लिए अपने गाँव गई। जब वो वापस आयी तो पता चला कि उसकी शादी तय हो गयी थी। मैं तो कविता को देख कर दंग ही रह गया। हमेशा सलवार-कमीज़ पहनने वाली कविता अब साड़ी में थी। उसकी चूचियां पहले से ज्यादा बड़ी लग रही थीं शायद कसे हुए ब्लाउज के कारण या फिर सच में बड़ी हो गयी थीं।

उसके चूतड़ पहले से ज्यादा मज़ेदार दिख रहे थे और कविता की चाल के साथ बहुत मटकते थे जिससे साड़ी का पल्लू बार-बार हिलता और उसकी कमर की गोरी चमक झलक जाती थी। कविता जब से वापस आयी थी उसका मेरे प्रति नजरिया ही बदल गया था। अब वो मेरे आसपास ज्यादा मंडराती थी। झाड़ू-पोछा करने समय कुछ ज्यादा ही चूचियां झलकती थीं जो उसके गहरे ब्लाउज से बाहर आने को बेकरार रहती थीं।

मैं भी मज़े ले रहा था पर मेरे लंड बहुत परेशान था उसे तो कविता की बूर चाहिए थी। मैं बस मौके की तलाश में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद मेरे मम्मी-पापा को किसी रिश्तेदार की शादी में जाना था एक हफ्ते के लिए। अब एक हफ्ते मैं और कविता घर में अकेले थे।

हमारे घर वालों को हम पर कभी कोई शक नहीं था उन्हें लगता था कि हम दोनों के बीच में ऐसा कुछ कभी नहीं हो सकता। इसलिए वो निश्चिंत होकर शादी में चले गए। जब मैं दोपहर को कॉलेज से वापस आया तो देखा कि कविता किचन में थी। उसने केवल पेटीकोट और ब्लाउज पहना था।

उस दिन गर्मी बहुत ज्यादा थी और कविता से गर्मी शायद बर्दाश्त नहीं हो रही थी। कविता की गोरी कमर और मस्त चूतड़ों को देख कर मेरे लंड झटके देने लगा। मैं ड्राइंग रूम में जाकर बैठ गया और कविता को खाना लाने को कहा।

जब कविता खाना लेकर आयी तो मैंने देखा कि उसने गहरे गले का ब्लाउज पहना है जिसमें उसकी आधी चूचियां बाहर दिख रही थीं। उसकी गोरी गोरी चुचियों को देख कर मेरा लंड और भी कड़ा हो गया और मेरे पैंट में तम्बू बन गया।

मैं खाना खाने लगा और कविता मेरे सामने सोफे पर बैठ गयी। उसने अपना पेटीकोट कमर में खोंस रखा था जिससे उसकी चिकनी टांगें घुटने तक दिख रही थीं। खाना खाते हुए मेरी नज़र जब कविता पर गयी तो मेरे दिमाग सन्न रह गया।

कविता सोफे पर टांगें फैला के बैठी थी और उसकी पेटीकोट जांघ तक उठी हुई थी। उसकी चिकनी जांघों को देखकर मुझे लगा कि मैं पैंट में झड़ जाऊंगा। कविता मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी।

उसने पूछा “और कुछ लोगे क्या अमित” मैंने ना में सर हिलाया और चुपचाप खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया तो कविता मेरे पीछे-पीछे आयी।

उसने पूछा “क्या हुआ अमित खाना अच्छा नहीं लगा क्या” मैंने बोला “नहीं कविता खाना तो बहुत अच्छा था” फिर कविता बोली “फिर इतनी जल्दी कमरे में क्यों आ गए जो देखा वो अच्छा नहीं लगा क्या” ये बोलते हुए कविता अपने बूर पर पेटीकोट के ऊपर से हाथ रख दी।

अब मैं इतना तो बेवकूफ नहीं था कि इशारा भी नहीं समझ पाता। मैं समझ गया कि कविता भी चुदाई का खेल खेलना चाहती है मौका अच्छा है और लड़की भी चुदवाने को तैयार थी।

मैं धीरे से आगे बढ़कर कविता को अपनी बाँहों में भर लिया। मेरी मजबूत बाहें उसकी नाजुक कमर के चारों ओर लिपट गईं और मैंने उसे अपने सीने से सटा लिया। उसकी नरम गोरी त्वचा मेरी छाती से टकराते ही एक गर्म सिहरन मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई। बिना कुछ बोले मैंने उसके गुलाबी होंठों को अपने मुंह में ले लिया और गहरी चुम्बन में खो गया। मेरी जीभ उसके होंठों के बीच घुसकर उसके मुंह की नमी चखने लगी। कविता भी मुझसे लिपट गयी और बेतहाशा मुझे चूमने लगी। उसके नरम स्तन मेरी छाती पर दब रहे थे और उसकी सांसें तेज होती जा रही थीं। “अमित मैं तुम्हारे प्यास में मरी जा रही थी मुझे जवानी का असली मज़ा दे दो” कविता बोल रही थी। उसकी आवाज में वासना और प्यास साफ झलक रही थी।

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मैंने कविता को अपनी गोद में उठाया। उसका हल्का शरीर मेरी बाहों में जैसे पिघल रहा था। मैं उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके बगल में लेट गया। मेरे हाथ उसके बदन पर घूमने लगे। मैंने पहले उसके ब्लाउज के हुक खोले और फिर पेटीकोट की नाड़ी खोल दी। कपड़े एक-एक करके उतरते गए और उसका गोरा बदन मेरे सामने पूरी तरह नंगा हो गया। मैंने खुद भी अपनी सारी कपड़े फेंक दिए और नंगा हो गया। मेरा लंड पहले से ही पूरा खड़ा होकर तन गया था।

कविता ने मेरे लंड को अपने नरम हाथ में भर लिया और धीरे-धीरे उसे सहलाने लगी। उसकी उंगलियां मेरे लंड की मोटाई को नाप रही थीं और ऊपर-नीचे हिल रही थीं। “हाय अमित तुम्हारा लंड तो बड़ा मोटा है आज तो मज़ा आ जाएगा” कविता अब सिर्फ काली ब्रा और चड्डी में थी। उसके गोरे बदन पर काली ब्रा और चड्डी बहुत ज्यादा सेक्सी लग रही थी। काली कपड़े उसके गोरे रंग को और भी उभार रहे थे।

मैंने शुरुआत तो कर दी थी पर मैं अभी भी कुंवारा था लड़की चोदने का मुझे कोई अनुभव तो था नहीं। शायद मेरी झिझक को कविता समझ गयी। उसने बोला “अमित तुम परेशान मत हो मैं तुम्हें चुदाई का खेल सिखा दूंगी तुम बस वैसा करो जैसा मैं कहती हूँ दोनों को खूब मज़ा आएगा” मैं अब आश्वस्त हो गया।

कविता ने खुद अपनी ब्रा खोल कर हटा दी। उसके गोरे गोरे चूचियां आजाद हो कर फड़कने लगे। वे भारी और गोल थे जिनके ऊपर गुलाबी निप्पल्स सख्त होकर खड़े थे। गोरी चुचियों पर गुलाबी निप्पल्स ऐसे लग रहे थे जैसे हिमालय की चोटी पर किसी ने चेरी का फल रख दिया हो।

कविता ने मुझे अपनी चुचियों को चूसने के लिए कहा। मैंने उसकी दाईं चूची को अपने मुंह में भर लिया और बछड़े की तरह जोर-जोर से चूसने लगा। मेरी जीभ उसके निप्पल को घेर रही थी और दांत हल्के-हल्के काट रहे थे। साथ ही साथ मैं दूसरे हाथ से उसकी बाईं चूची को मसल रहा था। मेरी उंगलियां उसकी नरम चूची के मांस को दबा रही थीं और निप्पल को बीच में पकड़कर खींच रही थीं।

कविता अपनी आँखें बंद करके सिसकारियां भर रही थी। “आह्ह्ह… अमित… और जोर से…” उसकी सिसकारियां कमरे में गूंज रही थीं। फिर मैंने धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी चड्डी की तरफ बढ़ाया। मेरी उंगलियां उसकी चिकनी जांघों पर फिसल रही थीं। कविता ने चूतड़ उठा कर अपनी चड्डी खोलने में मेरी मदद की। उसने कमर ऊपर उठाई और मैंने चड्डी को उसके पैरों से उतार दिया।

कविता की बूर देख कर मैं दंग रह गया। एकदम गुलाबी, चिकनी और पूरी तरह साफ बूर थी उसकी। झांटों का कोई नमो-निशान भी नहीं था। उसकी बूर की पतली लकीरें हल्की नमी से चमक रही थीं। मैंने ज़िंदगी में पहली बार असली बूर देखी थी मेरा तो दिमाग सातवें आसमान पर था।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस गुलाबी बूर के साथ मैं क्या करूं। कविता मेरी दुविधा को भांप गयी। उसने मेरा मुंह पकड़ के अपने बूर पर चिपका दिया और बोली “अमित चाटो मेरी बूर को अपने जीभ से मेरी बूर को सहलाओ”।

मैंने भी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसकी नमकीन बूर को चटाने लगा। मेरी जीभ उसकी बूर की ऊपरी लकीर पर घूम रही थी। उसका हल्का नमकीन स्वाद मेरी जीभ पर फैल गया। अलग ही स्वाद था उसकी बूर का ऐसा स्वाद जो मैंने जिंदगी में कभी नहीं चखा था क्योंकि वो स्वाद दुनिया में किसी और चीज में होता ही नहीं।

मैंने जानवरों की तरह उसकी बूर को चाट रहा था और अपनी जीभ से उसकी गुलाबी बूर के भीतर का नमकीन रस पी रहा था। मेरी जीभ उसकी बूर की ऊपरी फांकों को अलग करके अंदर तक घुस रही थी। गर्म और चिपचिपा रस मेरी जीभ पर फैल रहा था जिसका खट्टा-मीठा नमकीन स्वाद मुझे पागल कर रहा था। मैं जोर-जोर से चूस रहा था और अपनी नाक से उसकी बूर की हल्की मादक खुशबू ले रहा था। कविता की कमर बार-बार उठ रही थी और उसके चूतड़ मेरे चेहरे पर दब रहे थे।

कविता की सिसकारियां बढ़ती जा रही थीं और उन्हें सुन-सुनकर मेरा लंड लोहे की तरह कड़ा हो गया था। उसकी सिसकारियां अब चीखों में बदल रही थीं। “आह्ह्ह… अमित… जीभ अंदर डालो… हां… यही… उफ्फ्फ…” हर सिसकारी के साथ उसकी बूर से और ज्यादा रस निकल रहा था जो मेरे मुंह और ठोड़ी पर बह रहा था। मेरे लंड पर नसें फूल गई थीं और उसका सुपाड़ा लाल होकर चमक रहा था।

१० मिनट के बाद कविता बोली “अमित डार्लिंग अब मेरी बूर की खुजली बर्दाश्त नहीं हो रही अपना लंड पेल दो और मेरी बूर की आग शांत करो” मैंने जैसे ब्लू फिल्मों में देखा था वैसे करने लगा। उसकी आवाज में बेतहाशा प्यास थी।

कविता की दोनों टांगों को फैलाया और अपना लंड उसकी बूर में घुसाने की कोशिश करने लगा। मैंने उसके घुटनों को पकड़कर पूरी तरह खोल दिया। मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गुलाबी बूर के मुंह पर रगड़ रहा था। कुछ तो कविता की बूर कसी हुई थी कुछ मुझे अनुभव नहीं था इसलिए मेरे पूरे कोशिश के बावजूद भी मेरा लंड अंदर नहीं जा रहा था। बार-बार फिसल जा रहा था।

मैं अपने आप पर शर्मिंदा हो गया। मेरे सामने कविता अपनी टांगों को फैला कर लेटी थी और मैं चाह कर भी उसे चोद नहीं पा रहा था। कविता मेरी बेचारगी पर हंस रही थी। उसके होंठों पर मुस्कान थी लेकिन आंखों में वासना भी।

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वो बोली “अरे मेरे बुद्धू राजा इतनी जल्दीबाजी करेगा तो कैसे घुसेगा जरा प्यार से कर थोड़ा अपने लंड पर क्रीम लगा और फिर मेरे बूर के मुंह पर टिका फिर मेरी कमर पकड़ के पूरी ताकत से पेल दे अपने लौंडे को”।

मैंने वैसे ही किया अपने लंड पर ढेर सारा वेसेलिन लगाया फिर उसकी दोनों टांगों को पूरी तरह चौड़ा किया और उसकी बूर के मुंह पर अपने लंड का सुपाड़ा टिका दिया। कविता की बूर बहुत गरम थी ऐसा लग रहा था जैसे मैंने चूल्हे में लंड डाल दिया हो। उसकी गर्मी मेरे लंड के पूरे सुपाड़े में समा रही थी।

फिर मैंने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी पूरी ताकत से पेल दिया। कविता की बूर को चीरता हुआ मेरा लंड आधा घुस गया। उसकी दीवारें मेरे लंड को जकड़ रही थीं। कविता दर्द से चिहुंक उठी “आराम से मेरे बालम अभी मेरी बूर कुंवारी है जरा प्यार से डालो फाड़ दोगे क्या”। उसकी आंखों में आंसू आ गए थे और चेहरा लाल हो गया था।

मैंने एक और जोर का धक्का लगाया और मेरे ७ इंच का लंड सरसराता हुआ कविता की बूर में घुस गया। पूरा लंड अंदर तक चला गया। कविता बहुत जोर से चीख उठी। उसकी पूरी देह अचकचाई और नाखून मेरी पीठ में गड़ गए। मैं घबरा गया देखा तो उसकी बूर से खून निकलने लगा था। हल्का गुलाबी खून उसके चूतड़ों पर बह रहा था।

मैंने पूछा “कविता बहुत दर्द हो रहा है क्या मैं निकाल लूं बाहर” कविता बोली “अरे नहीं मेरे पेलू राम ये तो पहली चुदाई का दर्द है हर लड़की को होता है पर बाद में जो मज़ा आता है उसके सामने ये दर्द कुछ नहीं है तू पेलना चालू कर”।

कविता के कहने पर मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाना शुरू कर दिया। कविता की बूर से निकलने वाले काम रस से उसकी बूर बहुत चिकनी हो गयी थी और मेरा लंड अब आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था।

मैंने धीरे-धीरे पेलने की रफ्तार बढ़ा दी। हर धक्के के साथ मेरा मोटा लंड उसकी कसी हुई बूर को पूरी गहराई तक चीरता हुआ अंदर-बाहर होने लगा। कविता की बूर अब पूरी तरह चिकनी और गर्म हो चुकी थी। हर जोरदार धक्के पर उसके चूतड़ मेरी जांघों से टकराते और एक तीखी चपाक की आवाज कमरे में गूंज रही थी।

हर धक्के के साथ कविता की मादक सिसकारियां तेज होती जा रही थीं। उसकी मदहोश कर देने वाली सिसकारियों से मेरा जोश और बढ़ता जा रहा था। “आह्ह्ह… उफ्फ्फ… हां अमित… गहरा… बहुत गहरा…” उसकी सांसें फूल रही थीं और आंखें आधी बंद होकर ऊपर चढ़ रही थीं।

अब कविता भी अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर चुदवा रही थी। वह हर बार जब मैं अंदर धकेलता तो अपनी कमर ऊपर उठाकर मेरा लंड और गहराई तक ले लेती। “और जोर से पेलो और अंदर डालो आह्ह्हह्ह उम्म्म्म और तेज पेलो मेरी बूर में फाड़ दो मेरी बूर को पूरी आग बुझा दो” कविता की ऐसी बातों से मेरा लंड और फनफना रहा था। उसके शब्द सुनकर मेरे लंड की नसें और फूल गईं।

कविता तो ब्लू फिल्म की हीरोइन से भी ज्यादा मस्त थी। उसका गोरा बदन पसीने से चमक रहा था और उसके बड़े-बड़े चूचे हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे। १५-२० मिनट की ताबड़तोड़ पेलम-पेल के बाद मुझे लगा कि मैं उड़ने लगा हूँ। मेरे लंड के अंदर एक गर्म लहर उठ रही थी जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं बोला “कविता मुझे कुछ हो रहा है मेरे लंड से कुछ निकलने वाला है मैं फट जाऊंगा”।

कविता बोली “ये तो तेरा पानी है डार्लिंग उसे मेरी बूर में ही निकालना मैं भी झाड़ने वाली हूँ आह्ह्ह आह्ह्ह इस्स्स्स उम्म्मम्म” थोड़ी देर बाद मेरे लंड से पिचकारी निकल गयी और कविता की बूर को भर दिया। गर्म-गर्म मोटी धारें एक के बाद एक उसके गर्भाशय तक पहुंच रही थीं।

कविता भी एकदम से तड़प उठी और मुझे अपने सीने से भींच लिया। उसकी बूर का दबाव मेरे लंड पर बढ़ गया जैसे वो मुझे निचोड़ रही हो। उसके अंदर की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और मेरे लंड को दबोच रही थीं। उसकी पूरी देह कांप उठी और एक लंबी चीख के साथ वो भी झड़ गई।

दो मिनट के इस तूफान के बाद हम दोनों शांत हो गए और एक दूसरे पर निढाल हो कर लेट गए। मेरी पहली चुदाई के अनुभव के बाद मुझमें इतनी भी ताकत नहीं बची थी कि मैं उठ सकूं।

हम दोनों वैसे ही नंगे एक दूसरे से लिपट कर सो गए। एक घंटे बाद कविता उठी और अपने कपड़े पहनने लगी। मेरा मूड फिर से चुदाई का होने लगा तो उसने मना कर दिया बोली “अभी तो पूरा हफ्ता बाकी है डार्लिंग इतनी जल्दीबाजी मत करो बहुत मज़ा दूंगी मैं तुमको”।

पूरे हफ्ते हम दोनों ने अलग-अलग तरीके से चुदाई का खेल खेला बाकी कहानी फिर कभी सुनाऊंगा।

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